Sunday, January 24, 2021

पहले इश्क़ का आख़िरी अंज़ाम।

Pahle ishq ka akhiri anzam





 









तुम चार दिन

के इश्क़ में ही

बेवफ़ा हो गए।


और एक हम जो

बरसों तक तुमसे

कभी खफ़ा ना हुए।


पहले इश्क़ का

आख़िरी अंज़ाम

शायद यही होना था।


Tum chaar din 

Ke ishq mein hi

Bewafa ho gaye.


Aur ek hum jo

Barson tak tumse

Kabhi khafa na huye.


Pahle ishq ka

Akhiri anzaam

Shayad yahi hona tha.


©नीतिश तिवारी।





Tuesday, January 12, 2021

लघुकथा-घर की पंचायत।

Laghukatha--ghar ki panchayat





बेनीवाल जी अपने पंचायत के सरपंच रह चुके थे। अपने चार बच्चों में से तीन की शादी करने के बाद छोटी लड़की की शादी के लिए योग्य वर की तलाश में थे। 


"आजकल अच्छे लड़के मिलते कहाँ हैं हजारी जी"

बेनीवाल जी ने अपने बचपन के साथी और सुख दुख के सहयोगी हजारी जी के साथ अपनी चिंता ज़ाहिर किया।


"अरे मिलेंगे कैसे नहीं, आप प्रयास ही नहीं कर रहे हैं। मैंने बोला था आपसे कि अपने फौजी बेटे से बात करो। वो भी तो सरकारी नौकरी में है। कोई ना कोई उसका यार दोस्त होगा सर्विस में, बात बन जाएगी। आखिर सरकारी नौकरी की बात कुछ और ही होती है। बिटिया का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।"

हजारी जी ने अपने बहुमूल्य सलाह से अवगत कराया।


कुछ दिन बाद ही बेनीवाल जी का फौजी लड़का छुटियों में घर आया तो उन्होंने बेटी की शादी की बात छेड़ दी। 

"बेटा, हम कह रहे थे कि बड़े वाले दामाद जी सरकारी नौकरी में हैं, सुमन के लिए भी कोई सर्विस वाला लड़का मिल जाता तो अच्छा होता। तुम्हारे नजर में कोई ऐसा लड़का है?"

"अरे बाबूजी, कहाँ सरकारी के चक्कर में पड़े हैं। कई लाख देने होंगे। इतने में कई काम हो जाएँगे।"

"लेकिन बेटा, घर की आखिरी शादी है। धूमधाम से होनी चाहिए और पैसे की क्या बात है, इतना जमीन है, एक बीघा बेच देंगे और क्या?"


ये भी पढिए: लघुकथा- बेटी का बाप।


जमीन बेचने की बात सुनकर फौजी बेटे की भौहें तन गयी। चेहरा ऐसे हो गया मानो जंग के लिए जा रहा हो।

बगल वाले कमरे में से फौजी बेटे की बहू ने बोला," शादी के नाम पर सारा धन लुटा दीजिए। अभी कितने काम बाकी है घर में।"

फौजी बेटे की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। बेनीवाल जी ने सरपंच रहते हुए ना जाने कितने झगड़ों को निपटाया था। लेकिन आज अपने घर के मामले को सुलझा नहीं पाए।


©नीतिश तिवारी।

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Fb/insta: poetnitish







 

Sunday, January 10, 2021

Dushmani ki chahat aur dosti se tum parhez rakhte ho.

Dushmani ki chahat aut dosti se tum parhez rakhte ho



 










दुश्मनी की चाहत और दोस्ती से तुम परहेज़ रखते हो,
मेरे लिए काँटे और अपने लिए फूलों की सेज रखते हो,
तुम्हारी ख़्वाहिश कि मैं ख़ाक हो जाऊँ दर्द-ए-तन्हाई में,
शायद इसलिए तुम चराग़-ए-नफ़रत बड़ी तेज़ रखते हो।


Dushmani ki chahat aur dosti se tum parhez rakhte ho,
Mere liye kaanten aur apne liye phoolon ki sej rakhte ho,
Tumhari khwahish ki main khaak ho jaun dard-e-tanhai mein,
Shayad isliye tum charag-e-nafrat badi tez rakhte ho.





मेरे आँसुओं के खरीदार तो बहुत मिले पर क़ीमत कोई लगा ना सका,
मैं बोली लगा रहा था अपने जज्बातों की, पर वो बेग़ैरत बाज़ार आ ना सका,
दावत-ए-सुख़न मिला था मुझे उसके सालगिरह की,
वो अपने यार के साथ पहली सफ़ में थे, मैं गीत कोई गा ना सका।


Mere aansuon ke khareedar toh bahut mile par keemat koi lagaa naa saka,
Main boli laga raha tha apne jajbaaton ki par wo begairat bazaar aa naa saka,
Dawat-e-sukhan mila tha mujhe uske saalgirah ki,
Wo apne yaar ke saath pahli saf mein the, main geet koi gaa naa saka.


©नीतिश तिवारी।


वीडियो भी देखिए:







Wednesday, January 6, 2021

Ishq phir se dubaara kar liya.

Ishq phir se dubaara kar liya

 












Photo credit: Unspoken voice.





लब खामोश हैं, दिल पर भी दस्तक ना हुआ,

हीर-राँझा वाला प्यार मुझे अब तक ना हुआ,

कोई आए और मुझे घायल करे अपनी अदाओं से,

बरसों बीत गए पर कभी ऐसा हरकत ना हुआ।


Lab khamosh hain, dil par bhi dastak na hua,

Heer- ranjha wala pyar mujhe ab tak naa hua,

Koi aaye aur mujhe ghayal kare apni adaon se,

Barson beet gaye par kabhi aisa harkat na hua.


मेरी मोहब्बत से उसने किनारा कर लिया,

मेरे बिना कैसे उसने अपना गुजारा कर लिया,

कल देखा मैंने उसे अपने रक़ीब की गली में,

लगता है उसने इश्क़ फिर से दुबारा कर लिया।


Meri mohabbat se usne kinara kar liya,

Mere bina kaise usne apna gujara kar liya,

Kal dekha maine use apne raqeeb ki gali mein,

Lagta hai usne ishq phir se dubaara kar liya.


आँधी भी है, बारिश भी है और मोहब्बत भी,

लफ्ज़ भी हैं, लहज़ा भी है और कड़वाहट भी,

कशमकश में है मंज़िल, रास्ता कैसे ढूँढ लूँ,

सजा भी है, साजिश भी है और शोहरत भी।


Aandhi bhi hai, barish bhi hai aur mohbbat bhi,

Lafz bhi hain, lahza bhi hai aur kadwahat bhi,

Kashmkash mein hai manzil, raasta kaise dhoondh lu,

Saja bhi hai, sajish bhi hai aur shohrat bhi.


©नीतिश तिवारी।


 ये वीडियो भी देखिए:








Tuesday, January 5, 2021

Two line romantic mohabbat shayari.

Two line romantic mohabbat shayari

 












Pic credit: unsplash.




Two line romantic mohabbat shayari.

दो लाइन की रोमांटिक मोहब्बत शायरी।


तेरा यूँ मुस्कुरा कर देखना हमें अच्छा लगता है,

तुम जब साथ होती हो तो प्यार सच्चा लगता है।


Tera yu muskura kar dekhna humen achcha lagta hai,

Tum jab saath hoti ho to pyar sachcha lagta hai.


कागज़ों पर उतर गए हैं जज़्बात हमारे,

तुमसे मिलकर अच्छे हुए हालात हमारे।


Kagazon par utar gaye hain jazbaat humare,

Tumse milkar achche huye halaat humare.


ख़्वाबों में दीदार हुआ था, हक़ीक़त में तुम समाई हो,

ऐसा लगता है कि तुम परियों के शहर से आई हो।


Khwabon mein deedar hua tha, haqeeqat mein tum samayi ho,

Aisa lagta hai ki tum pariyon ke shahar se aayi ho.


एक ख़त लिखा और लिफ़ाफे में बंद करके भेज दिया,

अपने दिल के जज़्बात मैंने उस ख़त में सहेज दिया।


Ek khat likha aur lifafe mein band karke bhej diya,

Apne dil ke jazbaat maine us khat mein sahej diya.


तारीफ़ कैसे करूँ जो खुद चाँद की मूरत है,

चाँद भी अब पूछ रहा, कैसी तेरी चाँद की सूरत है।


Tareef kaise karun jo khud chand ki murat hai,

Chand bhi ab pooch raha, kaisi teri chand ki surat hai.


©नीतिश तिवारी।


ये भी देखिए:







Monday, January 4, 2021

Book review- Ibnebatuti by Divya Prakash Dubey.

Book review- Ibnebatuti by Divya Prakash Dubey.



 











फ़ोटो: लेखक महोदय के फेसबुक से।





"पूरी दुनिया में एक भी डॉक्टर ऐसा नहीं है जो दवा के साथ दिन में दो बार प्रेमपत्र लिखने के लिए कहे। 

सब बीमारियाँ केवल दवा से कहाँ ठीक होती हैं!"


ऊपर लिखी हुई ये पंक्तियाँ, दिव्य प्रकाश दुबे जी की किताब इब्नेबतूती से हैं। इन्होंने चार और किताबें लिखी हैं और इब्नेबतूती इनकी पाँचवीं किताब है।


आप सोंच रहे होंगे कि मैं किताब का review क्यों लिख रहा हूँ? तो बात ऐसी ही कि जब अल्लू- गल्लू लोग किसी भी फ़िल्म का review कर सकते हैं तो मैं तो साहित्यकार हूँ। (अभी कोई मानता नहीं है इसलिए खुद ही उपाधि दे रहा हूँ), मैं तो किताब के बारे में लिख ही सकता हूँ।


अब दूसरा प्रश्न ये है कि क्या ये Sponsored post है? उत्तर है- बिल्कुल नहीं। दुबे सर ने इसके लिए एक रुपया भी नहीं दिया है और ना ही प्रकाशक Hind Yugm ने ये review लिखने के लिए कहा है। 

दुबे सर ने अगर कुछ दिया है तो अपनी बहुमूल्य सलाह, आशीर्वाद और बेहतरीन साहित्य। हिन्दी को हिंदी भाषी ( बाकी भाषा वालों से तो तब उम्मीद करेंगे जब अपने हिंदी वाले ही हिंदी को पढ़ लें।) तक  पहुँचाने के लिए बस यही प्रेरणा काफी है।


इब्नेबतूती में खास क्या है?


ये बिल्कुल वाज़िब सवाल है। ये किताब एक ऐसे बेटे की कहानी है जो अपनी माँ के जीवन में सिर्फ़ खुशियाँ देखना चाहता है। तब जबकि उसके पिता कब के उसे छोड़कर जा चुके हैं और वो भी अब साथ नहीं रहने वाला। ये किताब एक ऐसे माँ की कहानी है जिसने अपने बेटे की खुशी के ख़ातिर अपने खुशियों से समझौता तो कर लिया था लेकिन उसे कभी जगजाहिर नहीं होने दिया। कहते है कि हर रिश्ते में कुछ ना कुछ अधूरा रह ही जाता है। उसी अधूरे रिश्ते के पूरा होने की कहानी है इब्नेबतूती। 


इब्नेबतूती क्यों पढ़ें?


माँ और बेटे के रिश्ते पर लिखी हुई ये अपने आप में एक अलग तरह की कहानी है जो खत्म तो कभी नहीं होती, हाँ माँ के त्याग और समर्पण का एक एहसास  जरूर कराती है।


इब्नेबतूती क्यों ना पढ़ें?


मुझे तो ऐसी कोई वज़ह नज़र नहीं आती। अगर आपको पता लगे तो सूचित करिएगा।


निष्कर्ष।


मैंने कई किताबें पढ़ी हैं। रोज कुछ ना कुछ पढ़ता ही रहता हूँ। लेकिन ये किताब अपने आप में बिल्कुल अलग है। अलग इसलिए भी कि इस किताब का जो मूलभाव और उद्देश्य है वो बिल्कुल नया और अलग है। 

एक माँ के अतीत में कहीं विस्मृत हो चुके भावनाओं को वर्तमान के सुनहरे वक़्त के साथ अपनी शब्दों की जादूगरी से लेखक महोदय ने बखूबी से व्यक्त किया है।  


आज के लिए इतना ही। मिलते हैं फिर एक नए ब्लॉग पोस्ट के साथ। तब तक के लिए विदा दीजिए और पोस्ट अच्छी लगी हो तो शेयर कीजिए।


©नीतिश तिवारी।


ये भी पढ़िए: आलसी लोग आख़िर इतने स्वैग में क्यों रहते हैं?