Sunday, 29 September 2019

तुम वापस आ जाओ ना!

Tum wapas aa jao na
























Pic credit : Pinterest.

तुम वापस आ जाओ ना!

अब तेरे खयालों की खुशबू दरवाजे से नहीं आती। जब से तुमने मुझसे दूरी बनायी है तब से तुम्हारे खयाल कम आते हैं। दरवाजों से नहीं दरीचों से आते हैं।


घर के आँगन के कोने में पड़ी हुई सिल बट्टे ने भी उम्मीद छोड़ दी है। वही उम्मीद की जब रोज सुबह शाम तुम उस पर मसाले पीसा करती थी । तुम्हारे हाथ पीले हो जाते थे हर रोज। बिल्कुल वैसे जैसे कि हर रोज तुम दुल्हन बनने को तैयार बैठी हो।


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घर के दूसरी तरफ कुएँ के पानी की मिठास भी चली गई है। पहले उसी कुएँ के पानी से सींची गई सब्जियाँ कितनी स्वादिष्ट लगती थीं। अब तो घर की सब्जी भी बाजार जैसी लगती है बिल्कुल बेस्वाद।

तुम्हारे बिन सब कुछ सूना सूना हो गया है।
तुम वापस आ जाओ ना!

©नीतिश तिवारी।


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16 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 29 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. वाह बहुत खूब। बहुत ही प्याreeaur स्नेहिल मनुहार 👌👌👌👌

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  3. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (30-09-2019) को " गुजरता वक्त " (चर्चा अंक- 3474) पर भी होगी।

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  4. बहुत सुंदर रचना

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  5. Excellent thoughts my friends..keep on writing...

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  6. गहराई से निकले एहसास।
    बहुत उम्दा।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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  7. वाह !लाज़बाब सृजन
    सादर

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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