पतंग और इश्क़।
























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सच्चाई की दुहाई खुद्दारी के कसीदों से देते हो,

पुरानी मोहब्बत को तुम झूठी उम्मीदों से ढोते हो,
इश्क़ के पतंग की डोर तो कब की टूट चुकी है,
फिर भी उसके नाम की कॉफ़ी हर रोज पीते हो।

Sachhai ki duhai khuddari ke karodon se dete ho,

Purani mohabbat ko tum jhuthi umeedon se dhote ho,
Ishq ke patang ki dor to kab ki toot chuki hai,
Fir bhi uske naam ki coffee har roj peete ho.

©नीतिश तिवारी।

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