Pic credit : Google.







खुद को मिटाते रहे उसके नाम के खातिर,
खुद को झुकाया हमने उसके एहतराम के खातिर।

सुना था इश्क़ में हीर राँझा हो जाते हैं,
हमने भी इश्क़ कर लिया इस इनाम के खातिर।

ना मासूमियत की कद्र थी ना रिश्तों की परवाह उसे,
पूरी डाली उसने काट दी एक पके आम के खातिर।

नामुमकिन को मुमकिन करने का उसे बड़ा शौक था,
मुझको भी बर्बाद किया अपने इस अंज़ाम के खातिर।

©नीतिश तिवारी।