मेरे नाम का सिंदूर है उसकी माँग में,
उसने हाथों में मेंहदी रचाई है मेरे लिए,
जब जब धड़कता है मेरा दिल उसके लिए,
बजती है उसकी पायल सिर्फ मेरे लिए,


तो कैसे ना करूँ मोहब्बत उस दिलरुबा से,
क्यों ना पूजूँ मैं अपनी अर्धांगिनी को,
जब इस सावन में मोहब्बत बरस रही है खुलकर,
क्यों न भींग जाऊं आज मैं जी भरकर।

©नीतिश तिवारी