Friday, 18 October 2013

भजन-ओ कान्हा रे.




 ओ कान्हा रे, मन तुझे ही पुकारे,

 ओ कान्हा रे, मन तुझे ही पुकारे,


 कोई नही है अपना मेरा, कोई नही पराया,

 कोई नही है सपना मेरा, कोई नही है साया.


 चाहे गम हो या खुशी हो, तुझको अपना माना,

 अब तो बस है तेरे ही, चरणो मे मेरा मेरा ठिकाना.


 ओ कान्हा रे, मन तुझे ही पुकारे,

 ओ कान्हा रे, मन तुझे ही पुकारे,


सेवक मैं हूँ स्वामी तू है,यही है अपनी कहानी,

दर्शन जो गर तेरे हो जाए,मिल जाए प्यासे को पानी.


भक्ति तेरी, शक्ति तेरी, यही है सच्ची आस,

मिलेगी मुक्ति सभी दुखों से, यही है मेरा विश्‍वास.


ओ कान्हा रे, मन तुझे ही पुकारे,

ओ कान्हा रे, मन तुझे ही पुकारे.

©नीतिश तिवारी।


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धन्यवाद.



5 comments:

  1. अति सुंदर रचना,उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं.!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर जी..

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  2. बहुत खुबसूरत भजन !!

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