Thursday, 7 March 2019

ग़ज़ल को उम्दा रखेंगे।












Image courtesy: Google.











हम तेरे वजूद को ज़िंदा रखेंगे, 
अमावश में भी एक चंदा रखेंगे।

लोग मुझे बहका हुआ आशिक़ समझें,
हम अपनी ग़ज़ल को थोड़ा उम्दा रखेंगे।

कोई पहचान ना ले भीड़ में हमको,
हम घर से निकलते वक्त पर्दा रखेंगे।

 इश्क़-ए- क़लाम से तक़लीफ़ है तो,
 हम आवाज़ को थोड़ा मंदा रखेंगे।

मेरी मोहब्बत का यकीन होगा तुम्हें,
हम साथ में फाँसी का फंदा रखेंगे।

©नीतिश तिवारी।


8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-03-2019) को "जूता चलता देखकर, जनसेवक लाचार" (चर्चा अंक-3268) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. बहुत ही बढ़िया गजल,नितीश जी।

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. कितने आशिकों ने झाँका है तेरी खिडकी में
    उसके लिए भी एक बन्दा रखेंगे ||

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