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हम तेरे वजूद को ज़िंदा रखेंगे, 
अमावश में भी एक चंदा रखेंगे।

लोग मुझे बहका हुआ आशिक़ समझें,
हम अपनी ग़ज़ल को थोड़ा उम्दा रखेंगे।

कोई पहचान ना ले भीड़ में हमको,
हम घर से निकलते वक्त पर्दा रखेंगे।

 इश्क़-ए- क़लाम से तक़लीफ़ है तो,
 हम आवाज़ को थोड़ा मंदा रखेंगे।

मेरी मोहब्बत का यकीन होगा तुम्हें,
हम साथ में फाँसी का फंदा रखेंगे।

©नीतिश तिवारी।