प्राची जैसे ही ऑफिस से घर शाम 7 बजे पहुँची तो सास तपाक से बोली, "बहू, जल्दी से चेंज करके नाश्ता बना दो, राहुल को देखने लड़की वाले आये हैं।" राहुल, प्राची का देवर था जिसकी शादी की बात कई महीनों से चल रही थी पर कहीं बात बन नहीं पा रही थी। कारण था कि राहुल कुछ करता नहीं था। हाँ मकान और बाप की प्रॉपर्टी अच्छी खासी थी।
"वो तो मैं बना दूँगी माँ जी लेकिन ये रिश्ता फाइनल कब होगा और देवर जी तो घर में ही हैं, वो क्यों नहीं कुछ करते?" प्राची ने थोड़े रूखे स्वभाव से बोला। सासू माँ कुछ नहीं बोली और गेस्ट के पास चली गयी।
थोड़ी देर बाद प्राची का पति संजय भी दफ़्तर से आ गया था। मेहमानों से औपचारिकता करने के बाद वो सीधे प्राची के पास किचन में पहुँच गया। "वाह री मेरी पहलवान पत्नी, ड्यूटी से आते ही किचन?" संजय ने कहा। प्राची ने भी बोल दिया," मुझे पहलवानी करने का कोई शौक नहीं है, देवर जी कुछ करते नहीं, माँ जी बस आर्डर देती रहती हैं, मैं क्या करूँ?" "अरे बाबा तुम नाराज़ मत हो, आज शादी फाइनल करवा दूँगा" इतना कहकर संजय मेहमानों के पास गया और बोला, "हमें दहेज नहीं चाहिए, लड़की पसन्द है। आप लोग शादी की डेट तय कीजिए।" लड़की वाले खुश हो गए। राहुल भौचक्का रह गया क्योंकि उसने अभी तक लड़की भी नहीं देखी थी, बस फोटो देखा था। मम्मी भी कुछ खास खुश नहीं थी। पर फैसला संजय को लेना था क्योंकि पिताजी नहीं थे।
"क्या संजय ने बड़े भाई का फ़र्ज़ अदा किया था या मुझे आराम देने के लिए जल्दी शादी फाइनल कर दिया था?" प्राची मन ही मन मुस्कुराते हुए ये सोच रही थी।
©नीतिश तिवारी।

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