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दिवाली थी तो चरागों का एहतराम किया,
दिल अपने जलाए और तेरे नाम किया।

खुदगर्ज़ी का शौक तो तुमने पाला था,
हमने तो अपना वक़्त भी तेरे नाम किया।

साँस लेने में हमें अब तकलीफ़ होती है,
जब से इन हवाओं को तेरा गुलाम किया।

दर्द देने की फितरत से तू बाज ना आया,
इसलिए हमने मोहब्बत सरेआम किया।

अंज़ाम-ए-वफ़ा क्या होता इस कहानी का,
खंज़र ले आया और मौत का इंतज़ाम किया।

©नीतिश तिवारी।