Friday, 14 June 2019

Garib Rath में यात्रा का अनुभव।



















हाँ जी, दोस्तों हाल ही में मैंने रेलवे यात्रा का आंनद उठाया। एक बार फिर से। उसी अनुभव के बारे में आपसे बात करूँगा। लालू यादव के वरदान स्वरूप प्राप्त हुए गरीब रथ में यात्रा का एक अलग ही आंनद है। कहने को तो सारे कोच 3AC हैं लेकिन कोच के अंदर का डिजाइन ऐसा है कि बहुत दिक्कत होती है।  खैर किराया कम है तो कुछ तो दिक्कत उठाना ही पड़ेगा।

दिल्ली से सफर की शुरुआत हो चुकी थी। ट्रेन समय से खुल चुकी थी। भारत में ट्रेन अगर समय से खुल जाए तो ये समझिए कि आपके टिकट का आधा पैसा वसूल हो गया। मैं हमेशा से सबसे ऊपर की बर्थ लेता हूँ ताकि दिन में भी सोने का मन हो तो सोया जा सके। खैर थोड़ी देर तक नीचे ही बैठा रहा। इसी बीच चाय, पानी और कोल्ड ड्रिंक की बिक्री शुरू हो चुकी थी। इतना तक तो ठीक था मतलब जनरल रूटीन। मजा तो अब आने वाला था। 

सामने वाले बर्थ पर एक भाई साहब बैठे थे। उनके पास 2 iphone था, एक छोटा और एक बड़ा। इसके अलावा एक सिंपल वाला फोन भी था। बार-बार एक फोन जेब से निकालते, फिर उसे रखते फिर दूसरा निकालते, फिर उससे बात करते। थोड़ी देर बाद फिर iphone निकालते, गाना सुनते। फिर रखते, फिर निकालते। यही सिलसिला करीब आधे घंटे तक चलता रहा। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछ ही दिया, "भाई साहब, आप कौन सा ऐसा बिजनेस करते हैं जो इतने महंगे फोन हैं आपके पास और इतना बिजी हैं आप?"
भाई साहब कुछ बोल नहीं पाए। हाँ, मतलब कुछ लोग ऐसा दिखावा करते हैं जैसे कि अम्बानी की तीसरी औलाद वही हैं। 

अभी ये बात खत्म ही हुई थी कि मेरे पास एक फोन आया बैंक से। बैंक वाला "सर, आपका एक लोन चल रहा है उस पर 2.5 लाख का top up आया है।" मैंने कहा, "अच्छा।" " जी सर, आपका top up आया है। तो कब प्लान कर रहे हैं आप?" मुझे बड़ा गुस्सा आया, मैंने गुस्से भरी आवाज में बोला "भाई साहब, बच्चा प्लान किया जाता है, लोन नहीं, जब जरूरत होगी तब बताऊँगा।" मैंने भी सुना दिया उसे। 

इसी बीच काले कोट वाले भाई साहब आ चुके थे। मैंने अपना टिकट चेक कराया। पड़ोस वाली सीट पर एक महिला अपने छोटे बच्चे को लेकर बैठी थीं। उनका टिकट किसी और के नाम का था। मतलब पुरुष के नाम पर महिला यात्रा कर रही थी। बात करने पर पता चला कि उन्होंने स्टेशन पर ही किसी से एक्स्ट्रा पैसा देकर टिकट खरीदा था। देखने में ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं लग रही थी, सीधा सा मतलब था कि वो ठगी का शिकार हुई थीं। इसमें दोनों की गलती थी, एक हमारे सिस्टम की और दूसरे यात्री की। वहीं पर अगले सीट एक लड़की बैठी थी उसके साथ भी यही मसला था। मैडम ने प्रीमियम तत्काल टिकट लिया था वो भी स्टेशन से। और मजे की बात तो देखिए कि उस टिकट पर बुकिंग डेट 2 महीने पहले की थी। सीधा मतलब था कि वो भी इस ठगी का शिकार हो गयी थी तब जबकि उनके पास iphone था। इस बात से यह सिद्ध होता है कि ब्रांड इस्तेमाल करने से बुद्धि नहीं आ जाती। एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी। मैडम ने फोन मिला दिया किसी को और TC को पकड़ा दिया। मतलब, " लीजिये बात कर लीजिए" वाली प्रथा हिंदुस्तान में कभी खत्म नहीं होगी।

इन सब के बीच रात्रि के 9 बज चुके थे। ट्रेन कानपुर पहुंच चुकी थी। मैंने खाना खाया और सोने के लिए जा ही रहा था कि एक मम्मी ने अपने बच्चे को आवाज लगाते हुए बोला," बेटा रोहन, मोबाइल दे दीजिए। आप बहुत देर से गेम खेल रहे हैं।" कुछ औरतें पब्लिक प्लेस में अपने बच्चों की बहुत इज्जत करती हैं और उन्हें आप बुलाती हैं। भले ही वही बच्चे घर पर दिन भर में चार बार कूट दिए जाते हों। अच्छा बच्चों के साथ एक समस्या और है। एक तो ये हाफ टिकट या बिना टिकट ट्रैवेल करते हैं और ऊपर से शोर बहुत मचाते हैं। हाँ, मतलब सोने में दिक्कत होती है ना। 

©नीतिश तिवारी।

10 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16 -06-2019) को "पिता विधातारूप" (चर्चा अंक- 3368) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ....
    अनीता सैनी

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    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. मजेदार सफर नितीश जी

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  3. रोचक यात्रा संस्मरण।

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  4. रोचक विवरण

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  5. जब तक लालू जी द्वारा करवाए गए ''इंटीरियर डेकोरेशन'' का विवरण और उससे हुई ''सहूलियतों'' की चर्चा ना हो तब तक अनुभव पूरे कहाँ होते हैं !

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    1. ठीक है सहूलतें तो दी हैं लेकिन वही बात है कि बहुत कम जगह है।

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