इतना आसान नहीं था खुद को संभालना। तुम्हारे जाने के बाद जब आँखों से आँसुओं की बरसात होती थी तो मुझे समंदर से मिन्नतें करनी पड़ती थी कि मेरे आँसुओं को भी थोड़ी सी जगह दे दे।
भँवरे द्वारा भेजे गए हजारों खत पढ़ने पड़े जिसमें फूलों द्वारा उसके साथ की गई बेवफाई की दास्तान लिखी थी।
हर पत्थर पहाड़ से टूट कर नीचे गिरता जा रहा था। इस बात का गवाह बनने के लिए पहाड़ ने भी मुझे बुलाया था। तुम ही सोचो कि बिछड़ने का दृश्य देखने की हिम्मत करने के लिए मैंने दिल पर कितने पत्थर रखे होंगे।
इन सब घटनाओं के बाद बदलाव यह हुआ कि मुझे काँटा होने का ख़िताब मिला, तुम्हें लोग अब भी गुलाब कहते हैं।बेवफाई का जहर मैंने पीया और प्रेम में अमर तुम हो गई।
खैर छोड़ो, मेरे लिए तुम कल भी पवित्र थी, तुम आज भी पवित्र हो। जहाँ भी हो खुश रहना।
©नीतिश तिवारी।

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