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असहाय दुख।

असहाय दुख






जिस दिन मुझे ये एहसास हो गया था कि तुम अब मेरे नहीं रहे उसी दिन मैंने जुगनुओं से चमकने की गुजारिश बंद कर दी। मैंने चाँद को ख़त लिख दिया था कि तुम्हारी खूबसूरती में चार चाँद लगाने अब पूर्णिमा की रात को तारे नहीं आएँगे। मैंने बारिश को भी खबर भिजवा दिया था कि बादल अब बेचैन नहीं रहेगा। इसका असर समंदर पर भी हुआ कि अब वो किसी कश्ती का इंतज़ार नहीं करता। 

मेरे साथ तुमने जुगनू, चाँद, तारे, बादल, बारिश, समंदर और कश्ती...सबको असहाय दुख की ओर धकेल दिया।


©नीतिश तिवारी।

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