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निष्पक्ष प्रकृति।

 








ब्रह्मांड ने कभी हिसाब नहीं रखा
कि किसने कितनी प्रार्थना की,
किसने कितने आंसू बहाए।
वह बस चलता रहा
अपने नियमों पर,
और नियम
कभी दया नहीं जानते।

सूरज हर सुबह उगता है 
उस पर भी, जिसने रात भर
किसी का गला घोंटा,
और उस पर भी, जिसने रात भर
किसी के लिए दुआ मांगी।

रोशनी
चरित्र नहीं पूछती,
वह बस
अंधकार को चीरती है।

बारिश गिरती है
फसलों पर भी, चिताओं पर भी,
वह नहीं जानती
कि नीचे उत्सव है या शोक।

पानी को बस
गिरना आता है,
भिगोना उसका काम है,
समझना नहीं।

और मृत्यु 
मृत्यु तो सबसे बड़ी सच्चाई है,
जो राजा से भी वही भाषा बोलती है
जो एक भिखारी से बोलती है।

वह न ताज देखती है,
न झोली,
वह सिर्फ़ आती है,
और ले जाती है,
जो उसका है।

शायद इसीलिए
हमने भगवान गढ़ा,
क्योंकि प्रकृति
बहुत निष्पक्ष है,
और निष्पक्षता,
कभी-कभी
क्रूरता जैसी लगती है।

©नीतिश तिवारी।


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