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प्रमाणों से परे प्रेम।






एक लुटेरा है जो घात लगाए बैठा है। एक आवारा है जो जीवन में दर्शनशास्त्र के अहमियत पर प्रवचन सुना रहा है। एक किनारा है जहाँ गर्दन तक पानी है। मानो वो लरकार रहा हो कि मेरे पास आओ। नजीदक आते ही तुम्हें डुबो दूँगा। इन सबसे बेफ़िक्र एक साधू है जो ध्यान में मग्न है।

अब आप सोंच रहे होंगे कि इन सबके बीच मैं कहाँ हूँ, मेरा वजूद कहाँ है। मैं उस भ्रम से बाहर निकलने में लगा हूँ जिसमें सपनो को हकीकत मान लिया गया था। ये मान लिया गया था कि दुनिया मे कोई मेरा अपना है। आज लगता है कि जीवन के इस खोखलेपन में कोई ठोस बात है तो वो ये है कि उस साँवली लड़की के साथ होने का एहसास ज़िंदा है। 

मैं आसपास की चीजों को देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि समय का चक्र अपने हिसाब से चल रहा है। जो मेरे और साँवली लड़की के बीच की आत्मीयता है वो अट्टहास वाला किनारा नहीं समझ पायेगा। लुटेरा तो हमारे दिल को बस्ती को उजाड़ने के प्रयास में ही है। उसे हमारे सुख को देखा नहीं जाता। आवारा इंसान प्रवचन देने में लगा है कि प्रेम सुख के अंत और दुख की शुरुआत का नाम है। साधु जो ध्यान में मग्न है उनके लिए सांसारिक प्रेम नहीं अपितु आध्यत्मिक प्रेम का महत्व ज्यादा है।

इन सबके बीच में मैं अपने आप को इस द्वंद में नहीं रखना चाहता कि मैंने सच्चा प्रेम नहीं किया था। मेरे प्रेम के विज्ञान में ऊर्जा और शिथिलता दोनों का समायोजन है। मैं इसलिए ही ये बात कह पा रहा हूँ कि मेरी और साँवली लड़की के मधुर सम्बन्ध को किसी प्रमाण की आश्यकता नहीं पड़ी। दरसअल प्रेम प्रमाणों से परे है। मैं किसी को गवाह नहीं बनाना चाहता। बस अपने प्रेम को आत्मसात करना चाहता हूँ। 


©नीतिश तिवारी।

 

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