पहली बार से ज्यादा चाहूंगा मैं तुम्हें दूसरी बार,
बस तीसरी बार मिलने की तुम हिमाकत ना करना।
आग को बुझाना मुमकिन है धुएँ को नहीं,
मैंने लाख कोशिशें की, तुम मेरे हुए तो नहीं।
समेट लूँगा मैं सारे समंदर का पानी भी,
तुम एक बूँद जितना प्यार करके तो देखो।
©नीतिश तिवारी।

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