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उम्मीद पर तो दुनिया कायम है।

उम्मीद पर तो दुनिया कायम है

 









कभी कभी ये दिन उदास सा लगता है। रातें भी तबाह होने लगती हैं। जब साया किसी का साथ छोड़ देता है तो इबादतें भी गुनाह लगने लगती हैं। शायद हमारी उम्मीदें ही कुछ ज्यादा रहती हैं। हम किसी से भी बेवज़ह यूँ ही उम्मीद पाल लेते हैं। लेकिन इज़ाजत लेकर उम्मीद तो लगाई नहीं जाती। फिर किसी से उम्मीद रखना गुनाह क्यों हो जाता है? सोचिए अगर फूल, खुश्बू से उम्मीद ना रखे तो क्या होगा? भँवरा, कली से उम्मीद ना रखे तो क्या होगा? बरसात, बादल से उम्मीद ना रखे तो क्या होगा? सच तो ये है कि सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और यही प्रकृति का नियम भी है। कहा भी गया है कि उम्मीद पर तो दुनिया कायम है।


©नीतिश तिवारी।

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4 Comments

  1. सच है उम्मीद पर ही दुनिया कायम है

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    1. जी। आपका धन्यवाद।

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२४-०७-२०२१) को
    'खुशनुमा ख़्वाहिश हूँ मैं !!'(चर्चा अंक-४१३५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    Replies
    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

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