Friday, October 16, 2020

तुम आग नहीं बनना अबकी बार, मैं पत्थर दिल बन जाऊँगा।

Pic credit: Google.




तुमने खामोशी इख़्तियार करने को कहा था, 
मैं गीत नहीं गाऊँगा,
तुम्हारी यादें सिरहाने पर दस्तक देती हैं, 
मैं तुम बिन नहीं सो पाऊँगा,

मोम का दिल था मेरा, 
 इसलिए ये जलकर पिघल गया ,

  तुम आग नहीं बनना अबकी बार,
 मैं पत्थर दिल बन जाऊँगा। 

Tumne khamoshi ikhtiyaar karne ko kaha tha, main geet nahi gaunga,
Tumahri yaden sirhane par dastak deti hain, main tum bin nahi so paunga,
Mom ka dil tha mera, isliye ye jalkar pighal gaya,
Tum aag nahi banna abki baar, main pathar dil ban jaunga.

©नीतिश तिवारी।


 

6 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 17 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-10-2020) को     "शारदेय नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएँ"  (चर्चा अंक-3858)     पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    शारदेय नवरात्र की 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. आपको भी नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। धन्यवाद।

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