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ख़त में महकते हुए फूल मज़ार तक पहुँच गए।

 

Pic credit: Google.



अरमानों की अर्थी को ख्वाबों की चिता पर सुलाती है,
ज़िन्दगी कुछ नहीं कर पाती जब मौत बेवक़्त आती है।

टूटे नाव की सवारी करके  दरिया पार करने से,
ज़िन्दगी दूर चली जाती है, मौत अपने पास बुलाती है।

हिज़्र की फिक्र तब नहीं थी जब वस्ल ने दामन थामा था,
अब जो कारवाँ उजड़ गया तो ज़िन्दगी कहाँ रह जाती है।

बाग से फूल निकले, ख़त में महकते हुए मज़ार तक पहुँच गए,
पर अब भी उसके यादों की खुशबू इस दिल को बहुत सताती है।

©नीतिश तिवारी।



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16 Comments

  1. बहुत सुन्दर सृजन ।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 30 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. बहुत ही सुन्दर...
    लाजवाब।

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  4. Replies
    1. धन्यवाद उर्मिला जी।

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 01 अक्टूबर 2020 को साझा की गयी है............ पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  6. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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