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मंज़िल 

हो मन उदास या तन थका 
तू अपनी मंज़िल की ओर चला 
राह में रोड़े आये या पहाड़ बड़ा 
तू चरण पादुका को अग्रसर बढ़ा
रख खुद पर भरोसा तेरे सर पर होगा ताज सजा 

अगर तू थम जायेगा 
तेरा स्वपन अधूरा रह जाएगा 
तेरा मेहनत धरा का धरा रह जाएगा
तू अपने सपनों का हत्यारा कहलायेगा 
फिर शायद तू कोई लक्ष्य हासिल ना कर पायेगा 

एक पड़ाव को मंज़िल समझ तू थम ना जा
मृगतृष्णा की इस दुनिया में आने वाले कल को ना भुला
एक दिन ऐसा आयेगा जो मंज़िल को तू पायेगा
तेरा मेहनत तेरा रंग लायेगा
तू भी सफलता के गीत गायेगा ।।

©शांडिल्य मनिष तिवारी।