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Showing posts from February, 2016

तड़पाने की अदा।

तेरी यादों के सफ़र से मैं क्यों ना गुजरूँ, फिर से ये मीठा दर्द मैं क्यों ना सह लूँ, तुझे आती है तड़पाने की अदा तो फिर से तड़पा मुझे, तेरी इस अदा से मैं क्यों ना जी लूँ, मर लूँ। ©नीतिश तिवारी।

क्यों गाँव मेरा वीरान हो गया?

क्यों गाँव मेरा वीरान हो गया? गुजरे वक़्त का एक पैगाम हो गया, लोग तो अब भी हैं मौजूद मगर, ये जैसे बिखरा हुआ सामान हो गया। कुछ हलचल कम है,क्योंकि लोग अपने में मग्न हैं, अब वो मस्ती कहाँ, अब वो चौपाल कहाँ, रोजी रोटी के चक्कर ने, सबको कर दिया बेबस है, शायद यही ज़िन्दगी का सबब है। बरसाती मेढ़क भी नहीं आते अब तो, शायद उनको भी कुछ खबर हो गया, वक़्त की ऐसी मार पड़ी है दोस्तों, मेरा गाँव भी अब शहर हो गया। कलम मेरी रुकने लगी, आंसू क्यों मुझे आने लगे, मेरा गावँ मेरा घर, क्यों मुझसे दूर जाने लगे। ©नीतिश तिवारी।

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