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Showing posts from July, 2015

इतना याद क्यूँ करती हो मुझे.

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ऐसा क्यूँ करती हो , तुम बार-बार, कि मेरी आँखों से पहुँच कर, मेरे दिल मे उतर जाती हो. और मैं फिर, एक द्वंद मे फँस जाता हूँ. कि मेरी आँखे खूबसूरत हैं  या मेरा दिल. इतना याद क्यूँ करती हो मुझे, की हिचकियाँ रुकने  का नाम नही लेतीं. और हर बार मैं तुम्हारे पास आने को बेताब हो जाता हूँ. ©नीतीश तिवारी

एक मंज़िल की तलाश थी.

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फ़ुर्सत अगर होता तो हक़ीकत बयान करते, बातों से नही अपनी नगमों से दास्तान कहते, ज़िंदगी की इस भीड़ ने दो राहे पर खड़ा कर दिया वरना, मंज़िल की क्या बात थी हमे रास्ते भी सलाम करते. मुझे चमचमाती रौशनी का शौक नही रहा कभी, बस एक अदद दीये की दरकार थी, और मुसाफिर कहते हैं लोग हमे इस भीड़ का, पर मुझे तो सिर्फ़ एक मंज़िल की तलाश थी. ©नीतीश तिवारी

पहचान अभी बाकी है.

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  बैठा रहा मैं एक किरदार सा बनके, उलझी हुई तस्वीर का आकार सा बनके, हमारी इबादत कभी मुकम्मल ना हुई, बीच भवंर मे फंस गये मझधार सा बनके. मुस्कुराते लबों की पहचान अभी बाकी है, मचलते हौसलों की उड़ान अभी बाकी है, समंदर से कह दो किनारों से आगे  ना बढ़े, अभी तो नीव पड़ी है, पूरा मकान अभी बाकी है. ©नीतीश तिवारी