Skip to main content

Posts

Showing posts from May, 2014

शायरी फिर से।

जलती हुई राख भी कम पड़ जाती है , जब तेरे दर्द की चुभन दिल को छू जाती है ,  और मैं तलाश करता  हूँ उस साहिल को , पर हर बार ये दरिया धोखा दे जाती है।  लहू का रंग अगर लाल  न  होता , तो शायद तेरी गली में मैं बदनाम न होता , एक ख्वाब नज़र आता था तेरी आँखों में मुझको , वरना यूँ ही मैं तेरे मोहब्बत पे कुर्बान न होता। 

Subscribe To My YouTube Channel