उन दिनों मैं रात 12 बजे तक पढ़ाई किया करता था। दिसम्बर की सर्दी थी, साल होगा कोई 1998. हमारे गाँव में बिजली कई सालों से नहीं थी। पड़ोस के गाँव में ठीक-ठाक बिजली आती थी। हमारे गाँव में बिजली इसलिए नहीं थी कि ट्रांसफार्मर फूँक जाने के बाद किसी के पास पैसा नहीं था कि चंदा करके ले आए। सरकार उस जमाने में आसानी से ट्रांसफार्मर नहीं देती थी। ढिबरी या लालटेन से पढ़ाई करता था। ये अविभाजित बिहार की कहानी है।
एक रात करीब 10 बजे बाहर कुछ आवाज सुनाई दी। ठंड के दिन में 10 बजे तक गाँव में सब सो जाते हैं। तुरंत का आया हुआ नींद जल्दी खुलती भी नहीं। मैं अचानक से डर गया। मेरे पास एक छोटा टॉर्च था। उसे लेकर मैं बाहर जाने लगा, ये देखने कि कौन है? अचानक मुझे एहसास हुआ कि पीछे से कोई मुझे खींच रहा है। मानो वो मना कर रहा हो कि बाहर मत जाओ। मैं और ज्यादा डर गया। चिल्लाकर किसी को बुलाना चाहा, लकिन ये क्या, मेरी तो आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। ऐसा लग रहा रहा कि रात के उस सन्नाटे ने मेरी जुबान को भी ख़ामोश कर दिया हो। मैं सोच ही रह था कि आगे क्या किया जाए तभी एक गाड़ी के बजने की आवाज सुनाई दी। मैंने थोड़ी राहत की सांस ली कि कोई जानवर तो नहीं है। फिर जब सब कुछ शांत हो गया तब करीब आधे घण्टे बाद मैं बाहर गया। कहीं कोई नहीं था। सब कुछ शांत। मैं अंदर आकर अपने कमरे में सो गया।
सुबह रोज की तरह 6 बजे मेरी आँख खुली। रात जितना सन्नाटा था सुबह उतना ही शोर हो रहा था। आँख मींचते हुए मैं बाहर निकला। पता चला कि पड़ोस के चाचाजी का किसी ने धारदार हथियार से गला रेतकर मर्डर कर दिया है। आज भी मैं सोचता हूँ कि क्या मैं उस रात उनकी जान बचा सकता था? पर मैं तो सिर्फ़ 9 साल का था।
©नीतिश तिवारी।

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