तन्हाई का इनाम।

















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वस्ल से पहले क्यों हिज़्र का फ़रमान दे दिया,
मुझको विदा किया और रास्ते का सामान दे दिया,
तुम तो कहते थे कि कीमती है हमारी मोहब्बत,
फिर वक़्त से पहले क्यों तन्हाई का इनाम दे दिया।

Wasl se pahle kyun hizr ka farmaan de diya,
Mujhko vida kiya aur raste ka saaman de diya,
Tum toh kahte the ki kimti hai humari mohabbat,
Fir waqt se pahle kyun tanhai ka inaam de diya.

नीतिश तिवारी।







Comments

  1. Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 28जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. रचना शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-07-2019) को "दिल की महफ़िल" (चर्चा अंक- 3411) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर।

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  4. बहुत उम्दा पोस्ट।

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  5. बहुत सुन्दर

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  6. वाह बहुत खूब

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

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  7. बहुत खूब नीतीश जी

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