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रात में नीले स्याही से तुम्हारा नाम लिखने की कोशिश करता रहा, लेकिन तुम्हारा नाम धुंधला नज़र आ रहा था। शायद स्याही भी बेवफ़ाई कर रही थी, बिल्कुल तुम्हारी तरह। पर मैं तेरे नाम को मिटने नहीं देना चाहता था, ना तो पन्ने से और ना ही अपने दिल से। इसलिए मैंने बार बार तुम्हारा नाम लिखा जब तक पन्ने पर तुम्हारा नाम साफ नजर नहीं आने लगा। फिर गौर से मैंने देखा तो तुम्हारे नाम में भी वही चमक बरकरार थी , वही चमक जब पहली बार तुम मिली थी। इतना प्यार है हमें तुमसे फिर भी बहुत खफा खफा रहती हो, शायद ये नाराज़गी लाजमी है। मैं ही तो तुम्हें वक़्त नहीं दे पा रहा हूँ। जिम्मेदारियों के बोझ ने वक़्त को कम कर दिया है। पर मैं कोशिश कर रहा हूँ ,जिंदगी को साथ लेकर चलने की, तुम्हें साथ लेकर चलने की। एक दिन होगी मुलाकात, फिर वही नहर के किनारे, शाम के डूबते किरण के साथ। और फिर से हमारा प्यार मुकम्मल हो जाएगा।

©नीतिश तिवारी।