सौंदर्य की साधना
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सौंदर्य की साधना।

काली घटा है घनघोर,
बिजली का भी है शोर,
सियाह-रात ऐसी है कि,
मन व्याकुल है विभोर।

पंख नहीं है उड़ने को,
होश नहीं है चलने को,
वो लथपथ है हुआ बेहाल,
साँस आयी है रुकने को।

पथ पर चलना गिरकर उठना,
करता रहा सौंदर्य की साधना,
आँसू उसके ऐसे बहते,
जैसे कोई गिरता हुआ झरना।

कर्म की ज्योत जलाने को,
निकला था भवसागर पार,
भाग्य की रेखा ऐसी पलटी,
खत्म हो गया जीवन संसार।

©नीतिश तिवारी।

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