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Friday, 17 January 2020

मुफ़लिसी के दौर ने।

Hindi shayari
Pic credit: Pinterest.







मेरी हर आरज़ू को तिश्नगी बनाकर रख दिया,
गिरने का डर ऐसा कि पत्थर हटाकर रख दिया,
लब तो आज़ाद थे फिर क्यों उन पर ताले पड़ गए,
मुफ़लिसी के दौर ने मेरी हस्ती मिटाकर रख दिया।

Meri har aarzoo ko tishnagi banaakar rakh diya,
Girne ka darr aisa ki pathar hatakar rakh diya,
Lab to aazad the phir kyun un par tale pad gaye,
Muflisi ke daur ne meri hasti mitakar rakh diya.

©नीतिश तिवारी।

12 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (१९-०१ -२०२०) को "लोकगीत" (चर्चा अंक -३५८५) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    -अनीता सैनी

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    1. मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति

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  3. लाज़बाब सृजन , सादर नमन आपको

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  4. आज के कटु सत्य को उजागर करती रचना. मुफ़लिसों का कोई रहनुमा नहीं होता. सुंदर रचना 👏 👏 👏

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