तुम्हारी ख्वाहिशें और मेरे सपने।

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तुम्हारी ख्वाहिशें और मेरे सपने।

सर्दी नहीं पड़ रही है इस बार, जानती हो क्यों? क्यूँकि हमारे रिश्तों में गर्माहट नहीं है। तुम्हारे खयाल, तुम्हारी ख्वाहिशें, तुम्हारे उसूल, सब वाज़िब हैं। लेकिन मेरे सपनों की तिलांजली देकर तुम्हें ख़्वाब देखने का कोई हक़ नहीं है। मेरे अरमानों की चिता जलाकर तुम अपनी ख्वाहिशें पूरा नहीं कर सकती। रेल की पटरियों की तरह बनने की कोशिश मत करो। बनना है तो समंदर बनो जिसमें तुम्हारी ख्वाहिशों की गहराई होगी और उस गहराई में डूबकर मैं अपने सपनों को पूरा कर सकूँगा। बस इतना ही। 

Love You 


‌©नीतिश तिवारी।