कुछ बातें हैं दिल में,
जिनको मैं बताना चाहता हूँ।
पर कोई नहीं मिलता सुनने वाला,
इसलिए लिख देना जानता हूँ।

कुछ वादें, कुछ कसमें, कुछ गीत, कुछ नज़्में,
याद करना चाहता हूँ, गुनगुनाना चाहता हूँ।
उन सूनी गलियों में भी ना जाने क्यों,
मैं एक रात बिताना चाहता हूँ।

बुझते दिये की लौ जलाना चाहता हूँ,
सूखे पत्तों को हरा बनाना चाहता हूँ।
इस अंजुमन में जो बिखरे से हालात हैं,
मैं उस हालात को सँवारना चाहता हूँ।

तेरे खाली जीवन में रंगों को भरना चाहता हूँ,
तेरे बासी किरण में भोर को देखना चाहता हूँ।
ये जो उलझी ज़ुल्फ़ों की काली घटाएँ हैं ना,
इन काली घटाओं से बारिश को देखना चाहता हूँ।

©नीतिश तिवारी।