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Showing posts from October, 2015

बस ख्वाहिश यही है कि...

मैं जीत जाऊं या मैं हार जाऊं, बस ख्वाहिश यही है कि मैं दरिया ये पार जाऊं। मैं किसी के दिल में रहूँ या किसी की यादों में रहूँ, बस ख्वाहिश यही है कि मैं अपनों की निगाहों में रहूँ। मैं उजालों में रहूँ या अंधेरों में भटकूँ, बस ख्वाहिश यही है कि मैं अपने मंजिल तक पहुँच सकूं। मेरा नाम हो या मैं गुमनाम हो जाऊं, बस ख्वाहिश यही है कि मैं एक इन्सान बन जाऊं। ©नीतिश तिवारी

ऐसा मुझे दिलदार ना मिला।

मुझे मेरे महबूब से कभी इकरार ना मिला, दोस्ती तो बहुत मिली पर प्यार ना मिला।  हम खरीद लेते पूरा जहान उसके खातिर, पर इस धरती पर ऐसा कोई ज़मींदार ना मिला। और बदलते वक़्त की आबो-हवा तो देखिये,  इन गहरी साँसों का कोई खरीदार ना मिला, हम इलज़ाम लगायें भी तो किस किस पर, कोई भी ऐसा शख्स मुझे कुसूरवार ना मिला।  बड़ा खतरा है इस ज़न्नत के रास्ते में , इस रास्ते पर मुझे कोई पहरेदार ना मिला, और हम लूटा देते अपनी सारी कायनात उस पे, पर अफ़सोस कोई ऐसा मुझे दिलदार ना मिला। ©नीतीश तिवारी

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