Sunday, November 19, 2017

तुम्हे प्यार किया।




इस इश्क़ की ना जाने कैसी तलब,
जो हमने अपना दिल हार दिया।
ये जानता था कि तुम बेवफा हो,
फिर भी हमने सिर्फ तुम्हे प्यार किया।

©नीतिश तिवारी।

Monday, November 13, 2017

मज़हब--लघुकथा।

"घर में भले ही हम दोनो पति पत्नी हों लेकिन यहाँ पर मैं एक अधिकारी और तुम एक इंस्पेक्टर हो", सबीना ने गुस्से भरे स्वर में अपने पति श्याम से कहा।
अलग धर्म के होने के बावजूद दोनो प्यार से रहते थे लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनके रिश्ते में कड़वाहट भर आई थी। कारण था उन दोनो का काम। 
सबीना ने अपने पति को फिर से कहा," अगर मेरे 22 मदरसों के खिलाफ तुमने कोई भी कार्यवाही की तो फिर मैं भी तुम्हारे 18 गौशलाओं के खिलाफ जांच बैठा दूंगी।" इंस्पेक्टर पति को अपने पत्नी से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी लेकिन सबीना भी तो IAS अधिकारी थी। वो लगातार बोलती रही। फिर उसने सवाल किया, " आजकल सभी सरकारी बिल्डिंग और बसों के रंग बदलकर भगवा किये जा रहे हैं। तुम उस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं करते?" अब श्याम को बोलने का मौका मिल गया था। उसने तुरंत बोला, " पहले भी तो सभी बसों का रंग हरा किया गया था और सारे योजनाओं के नाम के आगे समाजवादी लिखा हुआ था।" सबीना और श्याम की कभी ना खत्म होने वाली बहस जारी थी। और पास में बैठे दो हवलदार उनकी बाते सुनकर मुस्कुरा रहे थे।

©नीतिश तिवारी।

Sunday, November 5, 2017

इश्क़ मुकम्मल।























इश्क़ मुकम्मल हो या ना हो,
मैं एक बार इसे करूँगा जरूर।

विजय हो जाऊँ या पराजय मिले,
मैं एक बार युद्ध लडूंगा जरूर।

किसी को बुरा लगे या भला,
मैं एक बार सँच कहूँगा जरूर।

दुनिया को भरोसा नहीं आज मुझपे,
मैं एक बार मुकाम बनाऊंगा जरूर।

©नीतिश तिवारी।