Monday, February 24, 2014

बंदिशें,हसरतें और तुम.



बहुत बंदिशें हैं ज़माने की,
फिर भी बेताब हूँ तेरे दीदार को.
क्यूँ ना साथ मिले अब तेरा,
जब हम छोड़ आए अपने घर-बार को.

पलके झुकाए खड़ी हो तुम,
न जाने किसके इंतज़ार को,
दिल में कसक सी उठ रही है,
अब हो जाने दो इज़हार को.

कुछ हसरत मेरी निगाहों में है,
कुछ उलफत तेरी अदाओं में है,
कुछ बरकत उसकी दुआओं में है,
कुछ जन्नत तेरी वाफ़ाओं में है.

तेरी उलझी हुई इन ज़ुल्फों से,
 हर बार सुलझ जाता हूँ  मैं ,
तेरी कातिल भरी इन नज़रों में,
हर बार नज़र आता हूँ मैं.

अपने होठों की इन सुर्खियों पर,
अब नाम मेरा लिख दे तू,
अपने माथे की इस बिंदिया पर,
अब नाम मेरा लिख दे तू.
                                                                      
                                                                                                            with love
                                                                   your  nitish.

Thursday, February 13, 2014

इबादत मेरी,खुदा उसका.













मर्ज़ी उसकी थी,इरादा मेरा था,
पर्दे उसके थे, दरवाज़ा मेरा था.

ख्वाब मेरे थे,सच उसके हुए,
अल्फ़ाज़ मेरे थे,ग़ज़ल उसके हुए.

मंज़िल उसकी थी,रास्ता मेरा था,
खुशियाँ उसकी थी,दर्द मेरा था.

इबादत मेरी थी,खुदा उसका हुआ,
इनायत मेरी थी,वफ़ा उसका हुआ.

खंजर उसकी थी,कत्ल मेरा हुआ,
आँखें उसकी थी,आँसू मेरे हुए.