Tuesday, 30 January 2018

शायद प्रेम में...























तुम्हारे पुलकित प्रेम में,
वैसे तो मैं
हर प्रश्न का उत्तर दे पाता हूँ।
लेकिन ना जाने क्यों
तुम्हारे प्रश्नों के सामने
मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।
शायद प्रेम में कुछ ऐसा ही होता होगा।

सुबह से शाम हो जाती है
शाम से रात और 
और रात से सुबह।
हर पहर में सिर्फ
तुम याद आती हो।
शायद प्रेम में कुछ ऐसा ही होता होगा।

समंदर नदी को
अपने में समेटती है,
और मैं तुझमें
समा जाता हूँ।
शायद प्रेम में कुछ ऐसा ही होता होगा।

©नीतिश तिवारी।

Saturday, 27 January 2018

लघुकथा- घरेलू हिंसा।

















अंकिता और सुरेश की शादी को दस साल हो गए थे। एक 6 साल की बेटी भी थी। पहले सब कुछ ठीक रहा लेकिन बेटी होने के बाद दोनों में झगड़ा होना शुरू हो गया।
सुरेश अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से पूरा नहीं करता था और बोलने पर अपनी पत्नी को मारता पिटता था।

सुबह का समय था। डाईनिंग टेबल पर नाश्ता लग चुका था। "अरे पीहू बेटी, आ जाओ जल्दी से नाश्ता करने," अंकिता ने अपनी बेटी को आवाज लगाई।
"अभी आ रही हूँ मम्मी बस लिप्स्टिक लगाकर" बेटी ने जवाब दिया।
थोड़ी देर बाद पीहू अपने पूरे चेहरे और हाथ पर लिप्स्टिक से अजीब निशान बनाकर आई। ऐसा लगा मानो वो चोट के निशान थे। पापा ने पूछा," अरे बेटा पीहू ये क्या करके आई हो।" पीहू ने जवाब दिया," कुछ नहीं पापा बस मम्मी के जैसी दिखने की कोशिश कर रही हूँ।"
सुरेश अपनी पत्नी और बेटी से नजर नहीं मिला पा रहा था।

©नीतिश तिवारी।

Sunday, 14 January 2018

ग़ज़ल-रुसवा करके।



















रुसवा करके वो हमें छोड़ गए हैं,
हरे पत्तों को वो तोड़ गए हैं।

गुलाब तोड़ गए वो अपने हिस्से का,
मेरे लिए काँटों को छोड़ गए हैं।

कोई सीधा रास्ता अब नहीं मिलता मुझे,
इस तरह वो रास्तों को मोड़ गए हैं।

आज लिखने में कुछ दर्द हो रहा है,
मेरे हाथों को आज वो मरोड़ गए हैं।

©नीतिश तिवारी।

Friday, 12 January 2018

लघुकथा- दहेज.























भानु गुप्ता जी अपने शहर के मशहूर बिजनेसमैन थे. गुप्ता जी के बेटे की आयु 35 को होने को थी. इसलिए बेटे की शादी को लेकर परेशान रहते थे. बेटा सरकारी विभाग में क्लर्क था. रिश्ते तो कई आए लेकिन कहीं बात नहीं बन रही थी. शहर के मशहूर व्यापारी होने के कारण गुप्ता जी सामाजिक कार्यक्रम में भी हिस्सा लेते रहते थे.
आज उनके पड़ोस वाले वर्मा जी उनके बेटे के लिए एक रिश्ता लेकर लड़की के परिवार वालों के साथ आए थे. लड़का-लड़की एक दूसरे को पसंद आ गये. मामला रुका था तो बस दहेज की रकम को लेकर. गुप्ता जी की माँग दस लाख रुपये की थी लेकिन लड़की पक्ष पाँच लाख से ज़्यादा नहीं दे रहे थे.

रुपयों को लेकर बात चल ही रही थी की गुप्ता जी का फ़ोन बजा. गुप्ता जी, "हैल्लो".
"हाँ मैं रामवीर शर्मा बोल रहा हूँ. आज आपको 'दहेज एक कुरीति' के कार्यक्रम में आना था ना"
गुप्ता जी ने कार्यक्रम में आने का आश्वासन देकर फ़ोन रख दिया.

©नीतिश तिवारी.

Monday, 8 January 2018

महबूब।























एक रोज मेरे महबूब
ने मुझसे पूछा।
मेरे अलावा भी कोई
महबूब है क्या?
मैंने भी जवाब दे दिया,
हाँ, वो चाहती तो है मुझे
वो प्यार भी करती है,
मेरा खयाल भी रखती है,
मुझसे बातें भी करती है।
और मेरी 'वो' 
सिर्फ तुम हो।
मेरे महबूब सिर्फ तुम हो।

©नीतिश तिवारी।

Saturday, 6 January 2018

सुबह-सुबह।















ये चाय की चुस्की,
अखबार
और तुम्हारी यादें,
कमाल की बात तो देखो,
तीनों सुबह-सुबह ही आती हैं।

©नीतिश तिवारी।

Wednesday, 3 January 2018

मैं तुम्हे भूल नहीं पाता हूँ।
























कहते हैं वक़्त हर ग़म भुला देता है,
फिर मैं तुम्हे क्यों नहीं भूल पाता हूँ।
शायद तुम ग़म नहीं एक खुशी थी,
मेरे चेहरे की हंसी थी।

तुम एक कहानी थी,
मेरी ज़िन्दगी की रवानी थी।
तुम एक ख्वाब थी,
जो पूरा होते-होते रह गया।
तुम एक गुलाब थी,
जो खुलकर महक ना सका।

तुमसे बिछड़कर मैं गीत कोई
गा नहीं पाता हूँ।
मैं तुम्हे भुला नहीं पाता हूँ।

©नीतिश तिवारी