Saturday, 3 October 2015

बस ख्वाहिश यही है कि...



















मैं जीत जाऊं या मैं हार जाऊं,
बस ख्वाहिश यही है कि
मैं दरिया ये पार जाऊं।


मैं किसी के दिल में रहूँ या किसी की यादों में रहूँ,
बस ख्वाहिश यही है कि
मैं अपनों की निगाहों में रहूँ।


मैं उजालों में रहूँ या अंधेरों में भटकूँ,
बस ख्वाहिश यही है कि
मैं अपने मंजिल तक पहुँच सकूं।


मेरा नाम हो या मैं गुमनाम हो जाऊं,
बस ख्वाहिश यही है कि
मैं एक इन्सान बन जाऊं।
©नीतिश तिवारी

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-10-2015) को "स्वयं की खोज" (चर्चा अंक-2118) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर.

      Delete
  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  3. सुंदर रचना की प्रस्‍तुति।

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete